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हाई कोर्ट की रोक के बाद उत्तराखंड में महिला आरक्षण के भविष्य पर लटकती तलवार : क्या सरकार वापस दिला पायगी उत्तराखंड की महिलाओं को उनका हक ?

The sword hanging on the future of women's reservation in Uttarakhand after the High Court's banThe sword hanging on the future of women's reservation in Uttarakhand after the High Court's ban
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लेख- नीरज काला

वर्ष 2006 से चले आ रहे उत्तराखंड की महिलाओं के लिए 30% क्षैतिज आरक्षण पर बीते 24 अगस्त 2022 को उत्तराखंड हाइकोर्ट (Uttarakhand High Court) ने रोक लगा दी, जिस कारण उत्तराखंड की महिलाएँ एवं उत्तराखंड Uttarakhand Pcs की छात्रा अभियर्थी अपने भविष्य को लेकर चिंतित ओर आक्रोशित है । तथा रोड़ पर अपने हक के लिए आंदोलन कर रही है। इस वक्त Uksssc भर्ती घोटालो के कारण भी प्रदेश में आंदोलनों का सिलसिला जारी है।  इस बीच हाई कोर्ट के फैसले के कारण अब उत्तराखंड की महिलाएँ उत्तराखंड की धामी सरकार की ओर उम्मीद लगाएं देख रही है, कि कोर्ट द्वारा निरस्त आरक्षण (Reservation) को दुबारा बहाल करा कर सरकार उत्तराखंड की महिलाओं को उनका हक वापस दिलवा सके ।

आखिर क्या है क्षैतिज आरक्षण (what is horizontal reservation)

महिलाओं, ट्रांसजेंडर्स और विकलांग व्यक्तियों एवं सेवानिवृत्त सैनिकों को दिए जाने वाला आरक्षण ही क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) कहलाता हैं।

उत्तराखंड में महिला आरक्षण का इतिहास (History of women reservation in Uttarakhand)-

उत्तर प्रदेश से अलग होकर नये राज्य के बनने के 8 महीने बाद 18 जुलाई साल 2001 को उत्तराखंड की तत्कालीन सरकार द्वारा एक शासनादेश जारी किया गया। इस शासनादेश में कहा गया कि उत्तराखंड में महिलाओं को राज्य की सरकारी नौकरियों में 20% आरक्षण दिया जायेगा। यहाँ से ही सर्वप्रथम महिलाओं को आरक्षण मिलने की शुरूआत हुई। परंतु इस शासनादेश में यह जिक्र नहीं था कि यह आरक्षण सिर्फ उत्तराखंड की महिलाओं को दिया जायेगा। इस वजह से एक बार फिर एन0डी0 तिवारी की सरकार में 24 जुलाई साल 2006 को तत्कालीन मुख्य सचिव NS नपलच्याल ने भी एक नया शासनादेश जारी किया, जिसमें उत्तराखंड में राज्य के अंतर्गत होने वाली सरकारी नौकरी, निगमों और सार्वजनिक उद्यमों में महिलाओं को मिलने वाले आरक्षण को 20% से बढ़ाकर 30% कर दिया गया एवं यह भी साफ कर दिया गया कि यह आरक्षण सिर्फ उत्तराखंड की महिलाओं के लिए है, इसी शासनादेश के बल पर ही आज तक उत्तराखंड की महिलाओं को क्षैतिज आरक्षण दिया जा रहा था।

महिला आरक्षण पर कोर्ट का हस्तक्षेप (Court intervention on women’s reservation) कैसे हुआ  ?

साल 2021 में हुए उत्तराखंड अपर PCS की प्रि परीक्षा का रिजल्ट घोषित हुआ तो उत्तर प्रदेश एवं हरियाणा की कुछ महिला अभ्यर्थियों ने उत्तराखंड हाई कोर्ट में एक रिट याचिका (RIT) दलिख की, जिसमे कहा गया कि उत्तराखंड लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सिर्फ उत्तराखंड की ही महिलाओं को 30% क्षैतिज आरक्षण देना भारत के संविधान के विपरीत है एवं क्षेत्र एवं मूलनिवास के आधार पर आरक्षण देकर अन्य बाहरी राज्य के अभ्यर्थियों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। जो देश के संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का भी हनन है। हाई कोर्ट ने इस याचिका में दिए तर्कों को सटीक मानते हुए सुनवाई की और आदेश जारी करते हुए कहा कि 2006 में तत्कालीन राज्य सरकार की ओर से जारी हुए शासनादेश में जिसमें उत्तराखंड राज्य की महिलाओं को 30 % क्षैतिज आरक्षण दिया गया था यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19 और 21 के खिलाफ है एवं कोर्ट ने यह भी बताया कि संविधान के खिलाफ जाकर क्षेत्र के आधार पर कोई भी राज्य अपने प्रदेश में आरक्षण नहीं दे सकता है। यह अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। राज्य केवल आर्थिक रूप से कमजोर व पिछड़े तबके के लोगो को आरक्षण दे सकता है।

उत्तराखंड की महिला अभियर्थियों का इस फैसले पर क्या कहना है –

प्रदेश में भर्ती घोटालों की मार झेल रही एवं अब आरक्षण पर भी एक ओर मार झेल रही महिला अभ्यथियों का कहना है कि राज्य में पहले ही भर्तियां बहुत देरी से आती है। उत्तराखंड PCS परीक्षा अंतिम बार वर्ष 2016 में हुई थी एवं अब फिर 6 साल बाद 2021 मे आयोजित हुई है, वहीं दरोगा भर्ती साल 2015 में आयोजित हुई थी और अब सीधे 2022 में हुई है, हम सरकारी भर्ती के लिए वर्षों से तैयारी करते रहते है एवं परीक्षा पर अपनी नज़र लगाये रहते है, उनमें में भी कई परीक्षाओ में घोटाले हो जाते है एवं कई में रिजल्ट जारी नही होता, जिससे की अभ्यार्थी मेंटली टूट जाते है एवं अब ये माननीय हाई कोर्ट का नया फैसला हमसे 30% आरक्षण भी वापस ले लिया गया है जिससे कि महिला अभियर्थियों के सपने टूट गए है हम पहाड़ो में रहकर कई किलोमीटर दूर स्कूल-कॉलेज जाकर कड़ी मेहनत करते है एवं सरकारी परीक्षाओ पर आश लगाए रहते है हमारा अन्य राज्यों की महिलाओं से तुलना करना गलत है उत्तराखंड एवं अन्य राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियों में बहुत अंतर है जिस कारण हमें ये आरक्षण मिलना चाहिए और ये हमारा हक है ।

राज्य सरकार का पक्ष –

इस मामले पर सत्ताधारी पार्टी भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता रविंद्र जुगरान का कहना है कि सरकार हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनोती देने एवं इस पर अद्यादेश लाने के फैसले पर विचार कर रही है ,वही उत्तराखंड में महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्य ने कहा कि प्रदेश में महिलाओ के 30 फीसदी क्षैतिज आरक्षण के मामले पर वह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात करेंगी एवं साथ ही हाईकोर्ट के फैसले का परीक्षण कर इस पर उचित फैसला करेंगी जिससे उत्तराखंड मूल की महिलाओं को 30% आरक्षण का लाभ मिलता रहे ।।

मुख्यमंत्री धामी (Pushkar Singh Dhami) ने इस विषय पर क्या कहा –

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी Pushkar Singh Dhami ने कहा कि हम उत्तराखंड की महिलाओं को आरक्षण देने के लिए प्रतिवद्ध है उत्तराखंड में आरक्षण लागू रहे इस के लिए हम माननीय सुप्रीम कोर्ट तक जाने के लिए तैयार है हम अपने एजेंडे की जबरदस्त पैरवी माननीय शीर्ष कोर्ट में करेंगे ।

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